For Obtaining Superior Progency : -

The period from 5th January 2014 to 18th September 2014 is very auspicious for conception.

Parents desirous of making their child a devotee, a yogi or a Self-realized great man should earnestly read, hear, and reflect on the sacred scriptures viz. the Gita, Sri Ramayana, Sri Yoga Vasishtha etc. they should do pranayama, meditation, Yogic postures, kirtana, japa etc. They should discuss tipics related to Bhakti, Yoga, and Self-knowledge with each other. If the mother finds herself unable to do all these she should do mental japa, hear religious stories and discourses on Self-knowledge and reflect on the last. This will spiritualize every atom of the dhatus being produced in her body which in turn will influence the fetus developing in her womb. The expectant mother should avidly read and hear the religious stories, narrations of divine lila, biographies of devotees and saints, and satsang discourses of Self-realized great men. The should constantly practice remembrance of the Lord or Sadguru, whoever is the center of their faith, through meditation on their form.

Parents desirous of having valiant progeny like the great hero Hanumanji, Arjuna, Bhima and Shivaji should read or hear their heroic tales with deep interest and also contemplate them constantly.

The parents should fervently contemplate and remain preoccupied with such thoughts and actions that they want to inculcate in their child so that they can beget a child having that type of virtues and mental impressions. If one peeps in the annals of the history, one may find that Ravana, Hirnyakshipu, Kamsa, Duryodhana, Alexander the great, Adolf Hitler and Aurangazeb etc. who were weak in the practice of righteousness and ethics misused their exceptional abilities & strength in waging futile wars in the world and thereby destroyed social peace and tyrannized the people. Therefore the parents should gear themselves beforehand for begetting excellent progeny devoted to righteousness and ethics. This will truly prove beneficent for both the parents as well as for the entire universe.

Precautions to be observed before impregnation : 

For bearing exceptional progeny, the first and the foremost requirement is that both the parents should have sound body & mind. Under the guidance of an Ayurvedic physician they should undergo proper cleansing of the body (cleansing as per the procedure prescribed in the scriptures). They should practice Yoga postures, Pranayama, take prescribed diet etc. for minimum three months because the formation and subsequent purification of semen takes 902 days. They should attend a Dhyana, Yoga Shivir held in the Ashram in vicinity of Pujya Bapuji and do an anusthana of Mantra Japa, meditation, Yoga and observe Brahmacharya.

For the exceptional progeny :

The effect of planets and constellations is quite a lot on humans & living beings. Jupiter, Mercury, Venus and Moon-are considered to be auspicious planets. Out of these; Jupiter is the most auspicious one. When this planet becomes powerful, meritorious souls descend on the earth. The person with strong Jupiter in his horoscope is mostly blessed with the virtues of spirituality, noble character, knowledge and many other worthy traits. Therefore it is suggested that impregnation should take place during such an hour that the child is born; when the stars are powerful and are in excellent position.

The period between 5th January 2014 and 18th September 2014 is the best time for impregnation. The couple desirous of exceptional progeny should absorb themselves in maximum japa of ‘Guru-mantra.’ Alternatively the husband should undertake 2-3 anushthan of 40 days each. Similarly the wife should also do 2-3 anushthan of 21 days each. Then they must pray to the Lord to bless them with exceptional child before going of impregnation. They should observe the vow of celibacy for minimum one month before engendering the child. As part of their food; they should take cow’s milk, ghee, kheer and other sattvic food items and avoid taking tamsik food products such as egg, meat, alcohol, tobacco, stale food etc. As the fetus grows, the woman should avoid picking up heavy weight, travelling by any means of transport, exercise, scrubbing or sweeping the floor and many other such tasks that require bending down. They should not consume food items with hot effects such as red chilli, asafetida, fenugreek, black mustard, carrot, cotton-seed oil and strong medicines etc.

Working women should be more careful for their physical & mental rest during and after impregnation. Even for men; it is desirable to indulge in impregnation after taking due rest and mental happiness, Night vigil adversely affects energy, intellect and health. You must take night sleep even if you are awfully busy. You must have seen truck drivers working harder than us at nights; even then they don’t own any good house or car.
उत्तम संतानप्राप्ति के लिए
५ जनवरी २०१४ से १८ सितम्बर २०१४ तक का समय गर्भधान के लिए अति उत्तम है |

संतान को भक्त, योगी या आत्मज्ञानी महापुरुष बनाने की इच्छा हो तो माता-पिता ह्र्द्यपुर्वक गीता, भागवत, रामायण, श्री योगवासिष्ठ जैसे सद्ग्रंथों का रसपूर्वक श्रवण, पठन, मनन-चिंतन करें |प्राणायाम, ध्यान, आसन, कीर्तन, जप आदि करें | आपस में भक्ति, योग, आत्मज्ञान सबंधी चर्चा करें | यदि माता की क्षमता ये सभी करने की न हो तो केवल मानसिक जप, भगवत्कथा-श्रवण एवं आत्मज्ञान का श्रवण व विचार करे, जिससे माँ के शरीर में उत्पन्न हो रही धातुओं के अणु-प्रतिअणु में ये संस्कार समा जायें व गर्भस्थ बालक पर उसका प्रभाव पड़े | माँ को खूब रुचिपूर्वक भगवान की लीलाओं, संत-करितों, भक्तकथाओं, आत्मज्ञानी महापुरुषों के सत्संग-प्रवचनों को पढना-सुनना चाहिए | भगवान, सदगुरुदेव जिनमें भी श्रद्धा हो, उनका सतत ध्यान-स्मरण करना चाहिए |
महापराक्रमी हनुमानजी, अर्जुन, भीम, शिवाजी जैसे वीर पुत्रों की इच्छा करनेवाले माता-पिता इनके पराक्रमों का वर्णन अत्यंत रसपूर्वक सुने-पढ़े व उसका सतत चिंतन करें |

जिन्हें जिस प्रकार की संतान की इच्छा हो, उन्हें मन में उसी प्रकार के विचारों का मंथन करना चाहिए एवं उसके अनुरूप क्रियाएँ रसपूर्वक करनी चाहिए, जिससे उनके यहाँ इच्छित संस्कारों से सम्पन्न संतान आ सके एवं सद्गुणों को इच्छानुसार गर्भस्थ बालक में प्रस्थापित किया जा सके |

इतिहास को देखें तो धर्मबल व नीतिबल से रहित रावण, हिरण्यकशिपु, कंस, दुर्योधन, सिकंदर, हिटलर, औरंगजेब जैसी संतानों में अपनी असाधारण शक्ति से जगत में निरर्थक लढाइयाँ करके समाज को सुख-शांतिमय जीवन से वंचित किया | इसलिए धर्मबल व नीतिबल से युक्त उत्तम संतान की प्राप्ति के लिए माता-पिता पहले से ही तैयार हो जायें तो उनका व विश्व का दोनों का मंगल होगा |

गर्भाधान पूर्व की सावधानियाँ
उत्तम संतानप्राप्ति हेतु सर्व्प्रध्म पति-पत्नी का तन-मन स्वस्थ होना चाहिए | वैद्यकीय सलाह अनुसार शारीरिक शुद्धि (शास्त्रोक्त शोधन कर्म के द्वारा) आसन-प्राणायाम, आहार-विहार से कम-से-कम तीन महीनों तक करें | क्योंकि नया वीर्य ९० दिन में संस्कारित एवं पुष्ट होता है | मानसिक स्वस्थता के लिए पूज्य बापूजी के सान्निध्य में आयोजित ‘ध्यानयोग शिविर’ में भाग लें एवं मंत्रजप, अनुष्ठान, ध्यान, योग व ब्रम्हचर्य का पालन करें |

उत्तम संतानप्राप्ति के लिए

ग्रह-नक्षत्रों का असर मुनष्यों-प्राणियों पर ज्यादा होता है | ब्रहस्पति, बुध, शुक्र, चन्द्र – ये शुभ ग्रह हैं | उनमे भी ब्रहस्पति अत्यंत शुभ ग्रह है | ब्रहस्पति जब बलवान होता है, तब पुण्यात्माएँ पृथ्वी पर अवतरित होती हैं | बलवान ब्रहस्पति जिसकी जन्मकुंडली में होता है, उसमें आध्यात्मिकता, ईमानदारी, सच्चारित्र्य, विद्या और उत्तम विशेषताएँ होती हैं | इसलिए गर्भाधान ऐसे समय में होना चाहिए, जिससे बच्चे का जन्म बलवान उत्तम ग्रहों की स्थिति में हो |
५ जनवरी २०१४ से १८ सितम्बर २०१४ तक का समय गर्भधान के लिए अतिशय उत्तम है | उत्तम संतान की इच्छावाले दम्पति को अधिकाधिक गुरुमंत्र का जप या हॉट सके तो पुरुष को ४० – ४० दिन के तथा महिला को २१ – २१ दिन के दो – तीन अनुष्ठान करके उत्तम संतान हेतु परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए, तत्पश्च्यात गर्भाधान करना चाहिए | गर्भाधान से पहले कम-से-कम १ – २ माह का ब्रम्हचर्य – व्रत अवश्य रखें | गाय का दूध, घी, खीर और सात्त्विक आहार लें | अंडा, मांस, मदिरा, तम्बाकू, वासी भोजन, फास्टफूड जैसे तामसी पदार्थों का सेवन न करें | गर्भाधान के बाद ज्यों – ज्यों गर्भ बढे, त्यों – त्यों स्त्री को वजन उठाना, हर प्रकार की वाहन – यात्रा, व्यायाम, नीचे झुककर काम करना (जैसे झाड़ू – पोंछा) आदि कार्यों से बचते रहना चाहिए | लाल मिर्च, हरी मिर्च, हिंग, मेथी, राई, गाजर, कपसिया तेल (Cotton seed oil), गर्म दवाईयों और गर्भ पदार्थों का सेवन न करें |
नौकरी करनेवाली महिलाओं को गर्भाधान के दिनों में और बाद के दिनों में शारीरिक-मानसिक आराम पर ख़ास ध्यान देना चाहिए | पुरुषों को भी शारीरिक आराम और मानसिक प्रसन्नता के बाद ही गर्भाधान के लिए प्रवृत्त हों योग्य है | रात्रि-जागरण बल, बुद्धि, स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर करता है | काम-धंधा है तब भी रात्रि की नींद का फायदा लिया करो | तुमने देखा होगा कि ट्रक ड्राइवर का श्रम तुम्हारे-हमारे से ज्यादा है लेकिन कोई बढ़िया मकान या बढ़िया गाड़ीवाला नहीं मिलेगा | तन-मन-बुद्धि का रात्रि की नींद में जितना विकास होता है, उतना दिन की नींद में नहीं होता |

-    ऋषिप्रसाद – मार्च २०१४ से  

वास्तव में खनिज, नदी आदि देश की सच्ची सम्पत्ति हैं । इसलिए संतानप्राप्ति के इच्छुक दम्पतियों को चाहिए कि वे ब्रम्हज्ञानी संतो-महापुरुषों के दर्शन -सत्संग का लाभ लेकर स्वयं सुविचारी, सदाचारी एवं पवित्र बनें । साथ ही उत्तम संतानप्राप्ति के नियमों को जान लें और शास्रोक्त रीति से शुभ मुहूर्त में गर्भाधान कर परिवार व देश का नाम रोशन करनेवाली उत्तम संतान को जन्म दें ।
गर्भाधान के लिए समय :
•    ऋतुकाल (रजोदर्शन के प्रथम दिन से १६ वें दिन का काल) के प्रथम तीन दिन मैथुन के लिए सर्वथा निषिद्ध हैं । साथ ही ११ वीं व १३ वीं रात्रि भी वर्जित है ।
•    उत्तरोत्तर रात्रियों में गर्भाधान होने पर प्रसवित शिशु की आयु, आरोग्य, सौभाग्य, पौरुष, बल एवं ऐश्वर्य अधिकाधिक होता है ।
•    यदि पुत्र की इच्छा हो तो ऋतुकाल की, ४, ६, ८, १०, १२, १४ या १६ वीं रात्रि एवं यदि पुत्री की इच्छा हो तो ऋतुकाल की ५, ७, ९, या १५ वीं रात्रि में से किसी एक रात्रि का शुभ मुहूर्त पसंद करना चाहिए ।
•    रजोदर्शन दिन को हो तो वह दिन गिनना चाहिए । सूर्यास्त के बाद हो तो सूर्यास्त से सूर्योदय तक के समय के तीन समान भाग कर प्रथम दो भागों में हुआ हो तो उसी दिन को प्रथम दिन गिनना चाहिए । रात्रि के तीसरे भाग में रजोदर्शन हुआ हो तो दूसरे दिन को प्रथम दिन गिनना चाहिए।
•    पूर्णिमा, अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, पर्व या त्यौहार की रात्रि, श्राद्ध के दिन, चतुर्मास, प्रदोषकाल (त्रयोदशी के दिन सूर्यास्त के निकट का काल), क्षयतिथि (दो तिथियों का समन्वयकाल) एवं मासिक धर्म के तीन दिन समागम नहीं करना चाहिए ।
•    माता-पिता की मृत्युतिथि, स्वयं की जन्मतिथि, नक्षत्रों की संधि (दो नक्षत्रों के बीच का समय) तथा अश्विनी, रेवती, भरणी, मघा व मूल इन नक्षत्रों में समागम वर्जित है ।
•    दिन में समागम आयु व बल का बहुत ह्रास करता हैं, अत: न करें ।

·         गर्भाधान हेतु सप्ताह की रात्रियों के शुभ समय इस प्रकार हैं:








८ से ९

१०.३० से १२

७.३० से ९

७.३० से १०

१२ से १.३०

९ से १०.३०


९ से १२


१.३० से ३

१.३० से ३

१०.३० से १.३०

३ से ४


१२ से ३


•    रात्रि के शुभ समय में से भी प्रथम १५ व अंतिम १५ मिनट का त्याग करके बीच का समय गर्भाधान के लिए निश्चित करें ।

गर्भधारण के पूर्व कर्तव्य:
•    दम्पति की स्थिति शारीरिक थकन व मानसिक तनाव से मुक्त हो । परिवार में वाद-विवाद या अचानक मृत्यु की घटना न घटी हो । मन, शरीर व वातावरण स्वस्थ व स्वच्छ हो ।
•    आध्यात्मिकता बढे इसलिए दोनों नथुनों से लम्बे, गहरे श्वास लें । भगवत्कृपा, आनंद, प्रसन्नता, ईश्वरीय ओज को भीतर भर के श्वास रोकें, मन में सदविचार लायें । भगवन्नाम जपते हुए मलिनता, राग-द्वेष आदि अपने मानसिक दोष याद कर फूँक मरते हुए उन्हें श्वास के साथ बाहर फेंकें । गर्भाधान के पूर्व ५ से ७ दिन रोज ७ से १० बार यह प्रयोग करें । शयनगृह हवादार, स्वच्छ, सात्त्विक धुप के वातावरण से युक्त हो । कमरें में अनावश्यक सामान व काँटेदार पौधे न हों । कमरे में अपने गुरुदेव, इष्टदेव या महापुरुषों के श्रीचित्र लगायें तथा रेडियों व फिल्मों से दूर रहें । दम्पति सफेद या हलके रंगवाले वस्त्र पहनें एवं हलके रंग की चादर बिछायें । इससे प्राप्त प्रसन्नता व सात्त्विकता दिव्य आत्माएँ लाने में सहायक होगी ।
•    कम-से-कम तीन दिन पूर्व रात्रि व समय तय कर लेना चाहिए । निश्चित दिन में श्याम होने से पूर्व पति-पत्नी को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहन के सदगुरु व इष्टदेव की पूजा करनी चाहिए ।
•    दम्पति अपनी चित्तवृत्तियों को परमात्मा में स्थिर करके उत्तम आत्माओं को आव्हान करते हुए प्रार्थना करें: 'हे ब्रम्हांड में विचरण कर रही सूक्ष्मरूपधारी पवित्र आत्माओं ! हम दोनों आपको प्रार्थना कर रहें हैं कि हमारे घर, जीवन व देश को पवित्र तथा उन्नत करने के लिए आप हमारे यहाँ जन्म धारण करके हमे कृतार्थ करें । हम दोनों अपने शरीर, मन, प्राण व बुद्धि को आपके योग्य बनायेंगे।'
•    पुरुष दायें पैर से स्त्री से पहले शय्या पर चढ़े और स्त्री बायें पैर से पति के दक्षिण पार्श्व में शय्या पर चढ़े । तत्पश्च्यात निम्नलिखित मंत्र पढ़ना चाहिए:
अहिरसि आयुरसि सर्वत:प्रतिष्ठाSसि धाता त्वा
दधातु विधाता त्वा दधातु ब्रम्हववर्चसा भव ।
ब्रम्हा बृहस्पतिर्बिष्णु: सोम: सूर्यस्तथाsश्विनौ ।
भगोsथ मित्रावरुणौ वीरं ददतु में सुतम् ।

अर्थ: 'हे गर्भ! तुम सूर्य के समान हो, तुम मेरी आयु हो, तुम सब प्रकार से मेरी प्रतिष्ठा हो । धाता (सबसे पोषक ईश्वर) तुम्हारी रक्षा करें, विधाता (विश्व के निर्माता ब्रम्हा) तुम्हारी रक्षा करें । तुम ब्रम्ह से युक्त होओ । ब्रम्हा, बृहस्पति,विष्णु, सोम, सूर्य, अश्विनीकुमार और मित्रावरुण, जो दिव्य शक्तिरूप हैं, वे मुझे वीर पुत्र प्रदान करें ।'        (चरक संहिता, शारीरस्थानम्:८.८)
•    दम्पति गर्भ-विषय में मन लगाकर रहें । इससे तीनों दोष अपने-अपने स्थानों में रहने से स्त्री बीज को ग्रहण करती हैं । विधिपूर्वक गर्भधारण करने से इच्छानुकूल संतान प्राप्त होती है ।

-ऋषीप्रसाद, अप्रैल २०१४ से