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divya shishu sanskar
8/10/2012 2:58:00 AM
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7/15/2012 5:48:00 AM
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7/15/2012 4:31:00 AM


नारदजी के अहैतु की कृपा से भक्त प्रह्लाद का जन्म :-

नारदजी के अहैतु की कृपा से भक्त प्रह्लाद का जन्म :-

श्री नारद \जी ने अहैतु की कृपा से कयाधू को भक्ति, ज्ञान, वैराग्य की शिक्षा दी परंतु लक्ष्य रहता था गर्भस्थ बालक की ओर गर्भस्थ बालक भगवान का भक्त बने। कयाधू से भगवान के अनन्य भक्त शिरोमणि प्रह्लाद उत्पन्न हुए। प्रह्लाद ने गर्भ में सुने हुए नारदजी के उपदेश का प्रसंग अपनी पाठशाला के विद्यार्थियों को बहुत ही विशदरूप से सुनाया है, उसे 'श्रीमद् भागवत', सप्तम् स्कन्ध, अध्याय 6 में देख सकते हैं।
सभी माताएँ अपनी सगर्भा बहू-पुत्रियों को ऐसी अवस्था में भगवान की अच्छी-अच्छी कथाएँ सुनावें, पढ़ावें और भगवान के सुन्दर से सुन्दर चित्र दिखायें तथा घर की जैसी शक्ति (स्थिति) हो, उसके अनुसार गाय का दूध, घी, चावल, गेहूँ, मूँग, चीनी आदि शुद्ध, सात्त्विक वस्तुएँ खिलावें। लाल मिर्च, राई आदि, बाजार की बनी मिठाइयाँ तथा तीक्ष्ण, कड़वे, रूखे-सूखे पदार्थ न खिलावें क्योंकि सगर्भा बहन के द्वारा किये हुए भोजन का प्रभाव गर्भस्थ बालक पर अवश्य ही पड़ता है। इन पदार्थों से गर्भस्थ बालक को जलन होती है और उसके स्वभाव में भी चिड़चिड़ापन आदि कई प्रकार के दोष आ जाते हैं। गर्भिणी अवस्था में माताओं को नाना प्रकार की वस्तुएँ खाने की इच्छा मन में आती रहती है, जिससे वे दीवाल का चूना, मुल्तानी मिट्टी एवं कोयला आदि तक खा लेती हैं। इसलिए वृद्धा माताओं को गर्भवती बहू-बेटियों का पूरा-पूरा ख्याल रखना चाहिए तथा उनकी रूचि के अनुसार यथाशक्ति बढ़िया एवं पवित्र वस्तुएँ खाने को देनी चाहिए। अच्छे-अच्छे शास्त्रों को तथा अच्छी-अच्छी बातों को सुनाना चाहिए। ऐसा करने से उनके चित्त में प्रसन्नता होगी।



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