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माता : नारी का आदर्श स्वरुप :-

माता : नारी का आदर्श स्वरुप :-

      धर्म (आचारसंहिता) की स्थापना भले आचार्यों ने की, पर उसे सँभाले रखना, विस्तारित करना और बच्चों में उसके संस्कारों का सिंचन करना – इन सबका श्रेय नारी को जाता है। भारतीय संस्कृति ने नारी को माता के रूप में स्वीकार करके यह बात प्रसिद्ध की है कि नारी पुरुष के कामोपभोग की सामग्री नहीं बल्कि वंदनीय, पूजनीय है।
     
       हिंदू धर्म नारी को माता के रूप में अधिक मूल्य देता है| उसने मातृस्वरूप में ईश्वर की कल्पना की है| हिंदुत्व एक ऐसी मानवता है जो जगत का संचालन एक शक्ति के सहारे हो रहा है ऐसा मानती है| वह शक्ति आद्य शक्ति, जगन्माया कही जाती है| वह खुद परम पुरुष परमात्मा, परब्रह्म की ही आह्लादिनी शक्ति है| उसी की सत्ता मात्र है| इसलिए हिंदू धर्म कई किस्सों में जब कि जगत का संचालन विकट हो गया होता है तब आद्य शक्ति को वहाँ अग्रसर करता है और मातृस्वरूप में उसे स्वीकारता है|

       यही कारण है कि हिंदू धर्म महाकाली और जगदम्बा की पूजा को उतना ही महत्व देता है जितना कि राम, कृष्ण और शिव की उपासना को|

       नारी को माता का आदर्श माना गया है क्योंकि नारी जनन, पोषण, रक्षण और संहार, इन चारों क्रियाओं में सफल सिद्ध हुई है| नारी का ह्रदय कोमल और स्निग्ध हुआ करता है। इसी वजह से वह जगत की पालक, माता के स्वरूप में हमेशा स्वीकारी गयी है। 'ब्रह्मवैवरत पुराण' के गणेश खण्ड के 40 वें अध्याय में आया हैः

जनको जन्मदातृत्वात् पालनाच्च पिता स्मृतः।
गरीयान् जन्मदातुश्च योऽन्दाता पिता मुने।।
तयोः शतगुणे माता पूज्या मान्या च विन्दता।
गभर्धारणपोषाभ्यां सा च ताभ्यां गरीयसी।।


       'जन्मदाता और पालनकतार् होने के कारण सब पूज्यों में पूज्यतम जनक और पिता कहलाता है। जन्मदाता से भी अन्नदाता पिता श्रेष्ठ है। इनसे भी सौगुनी श्रेष्ठ और वंदनीया माता है, क्योंकि वह गभर्धारण तथा पोषण करती है।'

      इसिलिए जननी एवं जन्मभूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ बताते हुए कहा गया हैः जननी जन्मभूमि  स्वगार्दिप गरीयसी। सवर्तीथर्मयी माता सवर्देवमयो पिता.... माता सब तीथ􀉟 की ूितिनिध है।

      स्मृति कहती है कि माता का पद सबसे ऊँचा है, माता कभी भी अपनी संतान का अहित नहीं सोचती|
                              कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति|

       पुत्र कुपुत्र हो जाय परन्तु माता कभी कुमाता नहीं होती| माता माता ही रहती है| नारी को ‘मातृत्व’ करुणामयी जगन्माता का ही प्रसाद है|
                 
       संतान को नौ महीने गर्भ में धारण करने एवं विविध कष्ट सहकर भी उसका पोषण करने के कारण माता की पदवी सबसे ऊँची है |

       लोक में यह बात प्रसिद्ध है कि जब किसी भी व्यक्ति पर बड़ा भारी आकस्मिक संकट पड़ता है तब वह ‘ओ मेरी माँ...’ ऐसा उच्चारण सहज में ही कर उठता है| आपदि मातैव शरणं |आपत्ति में माता ही शरण है | और समं नास्ति शरीरपोषनं | माता के समान शरीर का पोषक कोई नहीं है|

       जगत में माता ही ऐसी है जिसका स्नेह संतान पर जन्म से लेकर शैशव, बाल्य, यौवन एवं प्रौढावस्था तक बना रहता है| यह मातृप्रेम मनुष्येतर जातियों में भी देखने में आता है| माता बालक का निर्माण कैसा कर सकती है यह अपने इतिहास में सुविदित है| माता कुंती ने पांडवो को धर्म पर दृढ़ रहते हुए क्षात्रधर्म और प्रजा पालन करने का उपदेश दिया था, जिसके अनुसार चलकर वे सदा कृतकार्य रहे| माता कौशल्या को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जननी कहलाने का सौभाग्य मिला|
       शिवाजी की माता जीजाबाई, शिवाजी को वीर बनाने के गीत पालने में ही सुनाती थी| बच्चे उतने ही ऊँचे उठ सकते है, जितनी ऊँची स्थिति में उनकी माता होती है| जैसी माता वैसी संतान; जैसी भूमि वैसी उपज|



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