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माता का कर्तव्य :-

माता का कर्तव्य :-
  
           जिस घर की नारियाँ सत्यप्रिय, सदाचारी, संयमी और ईश्वरभक्त होती हैं, उसी घर में महान आत्माओं का अवतरण होता है । नारी वास्तव में शक्ति का ही स्वरूप है । यदि वह अपनी महिमा को जान ले तो पापात्मा को भी सज्जन बना सकती है और इसके विपरित यदि वह चरित्रवान न हो तो सज्जनों के पतन का कारण भी बन जाती है । इसलिए नारी में दैवी सम्पदा के सद्गुणों का होना आवश्यक है ।
          रानी मदालसा अपने बेटों को बचपन से ही ब्रह्मज्ञान की लोरियाँ सुनाया करती थीं । फलतः उनके सभी पुत्रों को ब्रह्मज्ञान हो गया । दादी माँ की वेदांती लोरियों ने बालक लीलाराम को वेदांतकेसरी ब्रह्मनिष्ठ स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज बनाने में अतुलनीय योगदान दिया । माता महँगीबा की प्रभुध्यान की प्रेरणा ने बालक आसुमल से पूज्य ब्रह्मज्ञानी संत श्री आशारामजी बापू के रूप में विश्व को अद्भुत रत्न दिया ।
          गर्भ में बालक आते ही  माता को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिये| उसको यह ख्याल रखना चाहिये कि उसे एक उत्कृष्ट संतान को जन्म देना है| अपने बालक के लिये उसे एक आदर्श माता का काम करना है| उसे अपने तन-मन के स्वास्थ्य का खास ख्याल रखना चाहिये| शरीर निरोगी हो और मन में सद्विचार हो यही तन-मन का स्वास्थ्य है| माता के रक्त से बालक का पोषण होता है| माता का आहार-विहार शुद्ध एवं सात्विक होना जरुरी है| जन्म के समय के साथ ही बालक का मानसिक एवं शारीरिक विकास ऐसे ढंग से होना चाहिये कि वह एक आदर्श बालक बन सके| बालक को बाजारू चीजें एवं मिठाइयाँ खाने से रोकें| उसकी रूचि एवं आवश्यकता जानकार उसके लिये उचित आहार की व्यवस्था करें|
         बच्चे को कुसंग से बचने एवं कपट, चोरी, गाली आदि से रोकने का प्रयत्न करें| निर्भय, सत्यवादी एवं बलिष्ठ हों ऐसे प्रयोग एवं कहानियाँ सुनाकर प्रोत्साहन दें| गुरुजनों एवं बड़ों के आगे वह विनयी, नम्र एवं आज्ञाकारी होवे ऐसा भाव बच्चे में जगायें| बालक को रूचि एवं योग्यता के अनुसार पढ़ाई-लिखाई की शिक्षा दें और साथ-ही-साथ उच्चतम चरित्र की शिक्षा देना भी अनिवार्य है | शिक्षा का उद्देश्य आत्म-कल्याण है| अत: धार्मिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा की ओर तो उसे लगाना ही चाहिये| कन्याओं को खास तौर पार ऐसी शिक्षा देना चाहिये, जिससे वह सीता और सावित्री के आदर्श को अपना सके और आदर्श गृहिणी बन सके|
         संतान की जीवनवाटिका को सदगुणों के फूलों से सुवासित करने से खुद माता का जीवन भी सुवासित एवं आनंदमय बन जायेगा| संतान में यदि दुर्गुण के काँटे पनपेंगे तो वह माता को भी चुभेंगे, जीवन को खिन्नता से भर देंगे| इसलिए माता का परम कर्तव्य है कि संतानो के जीवन का शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक संरक्षण और पोषण करके आदर्श माता बन जाय.....अपने जीवन की महक से परिवार, समाज और पूरी पृथ्वी को सुवासित कर दे|



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