भावबल की शक्ति
भावबल की शक्ति
भावबल की शक्ति

भावबल की शक्ति
-पूज्य बापूजी
रामचन्द्र मुखर्जी की सुपुत्री शारदा देवी का बाल्यकाल में ही विवाह हो गया था | वह ५ वर्ष की थी और २३ साल के दुल्हे थे रामकृष्ण परमहंस | शारदा थोड़े दिन ससुराल रहकर फिर १७ साल मायके रही | लोग उसके पति के लिए कुछ-का-कुछ सुनाते थे कि, "वे पागल हैं, कभी हँसते हैं, कभी रोते हैं, कभी क्या करते हैं !" लोग नही समझते थे तो उनको पागल कहते थे लेकिन शारदा देवी मानती थी कि मेरे पति उच्चकोटि के संत हैं |

शारदा देवी २२ साल कि हो गयी | जब गंगा स्नान के मौके पर लोग कलकता (कोलकाता) जा रहे थे तो इस देवी ने कहा : "मैं भी अपने प्राणनाथ के, माँ के दर्शन करने दक्षिणेश्वर जाऊँगी |"

पैदल का जमाना था | शारदा को उन यात्रियों के साथ ६० मील की यात्रा में कीचड़-काँटेवाली जगह से पसार होना था | तेलो-भेलो जंगल बीच में था | वह जंगल इतना भयंकर और खूँखार डाकुओ से आतंकग्रस्त था की कोई अकेले जाने की हिम्मत नही करता था | पुरे झुंड-के-झुंड लोग जाते और फिर भी लूटे जाते, बलात्कार होते, क्या-क्या होता ! बागदी डाकू खूँखार ऐसे कि एक सेर अन्न या एक कपड़े के लिए किसी की गर्दन काट दें अथवा कोई स्त्री जँच गयी तो दिन-दहाड़े कुकर्म कर डालें |

शारदा लोगों के ताने सुन-सुनकर थोड़ी अस्वस्थ अवस्था में धीरे-धीरे चल रही थी, उसके पाँव में मोच भी आ गयी थी | साथ में जो लोग थे उन्होंने कहा : " ऐसे चलोगी तो रात को इस जंगल में हमारी जान जायेगी | यहाँ डाकू लोग शराब पीकर बड़ी बेरहमी से लुटते हैं |"

शारदा ने कहा : "मुझ अकेली के कारण आप सबका जान-माल कष्ट में ना पड़े, आप लोग निकल जाओ |"

मरते क्या न करते, उसको छोड़कर वे लोग निकल गये | सूर्य ढल गया था | अँधेरे में दिखे भी क्या और थकी हुई ! जोरों की बारिश, आँधी आयी | पेड का सहारा लेकर वह बैठ गयी | इतने में खूँखार डकेत शिकार खोजते-खोजते पहुँच गये और चारों तरफ से घेर लिया | पूछा : "तुम्हारे साथ कोई नही है ?"

शारदा ने सब कुछ सच-सच बता दिया और पास में जो कुछ कपड़े-पैसे थे, उनके सामने रख दिये | मुखिया ने पूछा : "तू कौन है और अकेली किधर जा रही है ?"
शारदा बोली : "पिताजी ! क्या आपने मुझे पहचाना नही ? मैं आपकी बेटी शारदा हूँ और आपके जमाई दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में पुजारी हैं, उनके पास जा रही हूँ | और मैं अकेली कहाँ हूँ, मेरे पिताजी और ये मेरे भाई तो मेरे साथ हैं |"

मुखिया के चेहरे के भाव बदल गये | साथी डकैत भी पानी-पानी हो गये |

मुखिया बोला : "हम लोग पापी हैं, तुम हमको पिता और भाई बोलती हो ?"

"नही, आप पापी नही हो, मेरी काली माँ की संताने हो | गलती तो आप के मन में है पिताजी !"

भावविभोर होकर डकैतों का मुखिया बोला : "बेटी ! आज की रात इस पापी पिता का घर पावन कर मेरी पुत्री !"

शारदा बोली : "चलिये पिताजी !"

डकैतों की पत्नियाँ इकट्ठी हो गयी और मुखिया की पत्नी ने शारदा को पलकों पर बैठा लिया | बोली : "हम लोग छोटी जाति के हैं | मैं गाँव की ब्राह्मणी कों बुला लाती हूँ | तेरे लिए वे बनायेंगी भोजन |"

शारदा : "तुम मेरी माँ हो, तुम ही ब्राह्मणी हो | हम दोनों मिलकर भोजन बना लेती हैं |"

माँ पानी-पानी हो गयी | भोजन के बाद कुछ देर आराम करके शारदा बोली : "पिताजी ! हमारे संग के लोग तारकेश्वर पहुँच गये होंगे और अब वे मेरी बाट देखते होंगे | आप कुछ भी करो मुझे वहाँ पहुँचाओ |"

उन डकैतों ने डोली सजाई और उस सुंदर युवती को डोली में बिठाया | डाकू डोली उठाकर ले जा रहे हैं | ज्यों ही तारकेश्वर नजदीक आया त्यों ही उस डकैत पिता ने कहा : "बेटी ! अब हम उधर नही आ सकते हैं | हमको पकड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार ने इनाम घोषित किया है |

शारदा : "पिताजी ! आपने मेरी बहुत सेवा की है और मेरे इन भाइयों ने मुझे कंधे पर उठाया है | आज से डाकुओं के नाम में आप लोगों का नाम नही रहेगा | आपके जमाई काली माँ के भक्त हैं, आप भी गाँव में माँ काली की पूजा शुरू करो | "
शारदा सकुशल चली गयी और डकैतों ने तब से डाका डालना छोड़ दिया | वे खेती आदि करके जीवनयापन करने लगे |

दुष्ट-से-दुष्ट व्यक्ति के अंदर भी अच्छाई छुपी है | आप अच्छाई को विकसित करो बस !

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