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व्रत विधि :-

व्रत विधि :-

जिन ऋषियों ने हमारे जीवन से पाशविक विचारों को हटाकर हमें परमेश्वर स्वभाव में जगाने के लिए प्रयास किया, जिन ऋषियों ने हमारे विकास के लिए सहयोग देकर समाज का उत्थान करने की चेष्टा की, उन ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का जो दिन है वही ‘ऋषि पंचमी’ है |

जब तक मनुष्य अपने आत्मतत्व को नहीं जानता, अपनी अद्वैतता को नहीं जानता, तब तक उसके द्वारा किये हुए शुभाशुभ कर्म उनको सुख-दुःख रूपी फल देते ही है | जाने-अनजाने ऐसे ऋषियों के प्रति हमसे कोई अपराध हो गया हो, किसी महिला द्वारा मासिक धर्म के समय संतद्वार , देव मंदिर या संत दर्शन हो गया हो तो इन अपराधों की क्षमाप्राप्ति  का भी यह दिन है | ज्ञात-अज्ञात पापों के शमन हेतु स्त्री-पुरुष दोनों यह व्रत करते है परंतु स्त्रियों को तो यह अवश्य ही करना चाहिए |

यह दिन त्यौहार का नही, व्रत का है| हो सके तो इस दिन अपामार्ग (लटजीरा) का  दातून करे | शरीर पर गाय के गोबर का लेप करके नदी में १०८ गोते मारने का विधान भी है | ऐसा न कर सको तो घर में ही १०८ बार ‘हरि’ का नाम लेकर स्नान कर लो | फिर मिट्टी या तांबे के कलश की स्थापना करके उसके पास अष्टदल कमल बनाकर उन दलों में सप्तर्षियों व वसिष्ठ पत्नी अरुंधती का आवाहन कर विधिपूर्वक उनका पूजन-अर्चन करे | फिर कश्यप, अत्री, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि व वसिष्ठ इन सप्तर्षियों को प्रणाम करके प्रार्थना  करें कि ‘हमसे कायिक, वाचिक व मानसिक जो भी भूले हो गयी है, उन्हें क्षमा करना | आज के बाद हमारा जीवन ईश्वर के मार्ग पर शीघ्रता से आगे बढे, ऐसी कृपा करना |’ तुम्हारी अहंता, ममता ऋषि चरणों  में अर्पित हो जाय, यही इस व्रत का ध्येय है | जो  ब्राह्मण ब्रह्मचिन्तन करता हो उसे सात केले, घी एवं शक्कर मिलाकर देने चहिए, ऐसा विधान है | अगर सात केले देने की शक्ति न हो और न दे सकते हो तो कोई बात नहीं | परन्तु दूसरे साल ऐसा अपराध नही करेंगे ऐसा दृढ़ निश्चय तो करना ही चाहिए |


इस दिन हल से जुते हुए खेत का अन्न, खैर अब तो ट्रैक्टर है, मिर्च-मसाले, नमक, घी, तेल,  गुड़ वगैरह का सेवन त्याज्य है | दिन में केवल एक बार भोजन करे | इस दिन लाल वस्त्र दान करने का विधान है |

हमारे महान ऋषियों ने पुरुष जाति के साथ ही स्त्री जाति के कल्याण का भी ख्याल किया है | स्त्री जाति पर आती आपत्तियों को हटाने के लिए उन्होंने स्वयं के मान-अपमान तक की परवाह नहीं की | जैसे, मतंग ऋषि ने शबरी भीलन को सहारा देकर  भक्ति जगत के पवित्र इतिहास में ऊँचा स्थान दिलाया, देवर्षि नारदजी ने हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधू को आश्रम में रखकर उपदेश देकर महान भक्त प्रल्हाद का प्राकट्य कराया | अग्नि-परीक्षा के बाद भी लोगों ने जिन सीताजी पर ऊँगली उठाना न छोड़ा, धोबी द्वारा जिन पर कलंक लगाया गया, ऐसी माता सीता को जब लोकापवाद के कारण वनवास जाना पड़ा, तब उन्हें सहारा देनेवाले वाल्मीकि ऋषि ही थे | उन्होंने माता सीता को आश्रय तो दिया ही, साथ-ही-साथ लव-कुश को भी महान विद्याएँ सिखाकर तेजस्वी बनाया |

जिन ऋषियों ने पुरुषों के जीवन को महान बनाया, जिन ऋषियों ने नारी जाति का गौरव बढ़ाने में सहयोग दिया, अनेक नारियों को महान बनाया, ऐसे समस्त ऋषियों की हम वंदना करते है | सुज्ञं समाज उनका ऋणी है |
          




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