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ऋषि पंचमी व्रत से सम्बंधित कथा :-

ऋषि पंचमी व्रत से सम्बंधित कथा :-
    ऋषि पंचमी व्रत की कथा भविष्योत्तर पुराण के हेमाद्री कांड में वर्णित है |
एक बार एक सुमित्र नाम का ब्राह्मण था उसकी पत्नी का नाम जयश्री था | सामान्यतया वो अपनी जिन्दगी अच्छे से जीते थे लेकिन उन्होंने सुखी जिन्दगी की कुछ बातो पर ध्यान नहीं दिया जैसे की आत्म संयम एवं सतर्कता |
ब्राह्मण की पत्नी जयश्री ने वेदों में वर्णित मासिक धर्म समय सम्बन्धी नियमो की तरफ ध्यान नहीं दिया | वो मासिक धर्म के दिनों में भी खाना बनाती थी और ब्राह्मण सुमित्र पत्नी के द्वारा  बनाया हुआ खाना खाता था |
    धीरे धीरे समय के साथ ब्राह्मण की बुद्धिमता और प्रतिभा भी कम होती गयी और उसकी योग्यतायें भी कुंठित हो गयी | उसे कीमती मनुष्य जन्म मिला था लेकिन उसने मानव जीवन में  दैवी सद्गुण बढ़ाने की तरफ कोई प्रयास नहीं किया | उसने अपना कीमती मनुष्य जिन्दगी पशुओ की तरह जीने में गँवा दी और मृत्यु के बाद उसे अपने अपराध के फलस्वरूप लगातार पशु योनियों में जाना पड़ा |
    यह वैज्ञानिक तरीके से भी सिद्ध हो गया है कि स्त्रियों के शरीर से मासिक धर्म के समय नकारात्मक उर्जा निकलती है, स्त्रियों का मन और जीवनी शक्ति नीचे के केन्द्रों पर एकाग्र होती है | इसीलिए अपने भले के लिए यह जरुरी है कि मासिक धर्म के समय ऋषियों और संतो द्वारा बताये गए नियम और सिद्धांतो का पालन करे | जैसे एक लड़का जो विद्यालय में ठीक से नहीं पढता और विद्यालय का काम भी ठीक से नहीं करता तो वह सफल नहीं हो सकेगा और वो पीछे रह जायेगा, भले ही वो बुद्धिमान हो अच्छे परिवार से हो, इसी तरह हम भी मानव जीवन नाम के विद्यालय में है और कर्म, सही-गलत, आत्मा-परमात्मा इत्यादि का ठीक से अर्थ समझे बिना हमारी बुद्धि आत्मतत्व को जान सके ऐसी ऊंचाई पर नहीं पहुँच पायेगी तथा जिससे  हम हमारे मानव जीवन का सच्चा महत्व नहीं समझ पाते है | अगर बेटा अपने पिता द्वारा दिए गये व्यापार एवं धन का ठीक से देखभाल नहीं कर पाता है तो उसका दिवालिया निकल जायेगा और उसे जीवन निर्वाह के लिए नौकरी करनी पड़ेगी | इसी तरह हम भगवान के सत, चित, आनंद स्वरुप पुत्र है जिन्होंने यह मानव देह धारण किया है और अगर हम उन्नति नहीं करेगे तो फलस्वरुप हमें नीचे की देहो में जाना पड़ेगा, येही प्रकृति का नियम है |
 
    अगले जन्म में वह  ब्राह्मण  सुमित्र और उसकी पत्नी जयश्री क्रमश: बैल और कुतिया की योनि में उसी घर में जन्म लिया |  ब्राह्मण  के बेटे का नाम सुमति और उसकी पत्नी का नाम चन्द्रावली था |
   बहुत लोगो का लेनदार देनदार का रिश्ता होता है, कर्म का सिद्धान्त ऐसा है कि २ अलग अलग देहो में जन्मी आत्माओ को साथ में रहना पड़ता है, जयश्री ने स्त्री मासिक धर्म के दिनों में ऋषियों द्वारा निर्धारित नियमो का पालन नहीं करने के कारण बहुत बड़ा पाप किया जिससे उसे कुतिया की योनि में जन्म लेना पड़ा और उसके पति ने लापरवाही के कारण अनजाने में ही सावधानी और ध्यान नहीं देने के कारण उसे बैल की योनि में जन्म लेना पड़ा |
   ब्राह्मणों का कर्त्तव्य है कि वो घर को पूरी तरह से स्वच्छता-सफाई रखे और जब वह ब्राह्मण अपने कर्त्तव्य का ठीक से पालन नहीं किया तो उसे उसका परिणाम भुगतना पड़ा |
एक दिन ऐसा हुआ की चन्द्रावली की भूतपूर्व सासूजी, उस कुतिया ने रसोईघर में प्रवेश किया और वो बहू चन्द्रावली उस वक़्त रसोईघर में काम कर रही थी तो उसने उस कुतिया की छड़ी से पिटाई कर दी |
    यह सब पुराणों से पहले हुआ होगा तभी यह सब घटना पुराणों में लिखी है जो कई हजारो वर्ष पहले लिखे गए थे, इसलिए यह कदाचित संभव है कि उस वक़्त इन्सान और जानवर एक दूसरे की भाषा समझ सकते हो | जिस कुतिया को चन्द्रावली ने मारा है वो उसी की सासू थी, पहले के दम्पति जो अभी बैल और कुतिया के रूप में थे | वो बेटे के घर के बाहर में बैठ कर खाना खाते हुए बाते कर रहे थे कुतिया ने कहा कि बहू ने मुझे बेरहमी से मारा है, मैंने ऐसा कौनसा पाप किया था जिसकी वजह से मेरे ही बेटे की पत्नी, जिसे हम इतने दुलार के साथ इस घर में लाये थे, मुझे मार रही है |
तब बैल ने कहा कि निश्चित रूप से हमने कोई तो पाप किया है |
       तब बहू चन्द्रावली ने सारा वृतांत सुन लिया, उसने अपने पति सुमित्र  ब्राह्मण के पुत्र अपने पति को सारी घटना कह डाली तब उसके पति ने कहा ओह ! यह मेरे माता पिता है और आज इस दुखद एवं दयनीय हालत में है, मुझे उनकी मुक्ति के लिए कुछ करना चाहिए |
     उन दिनों एक प्रख्यात मुनि सर्वतपा उस इलाके में रहते थे, वे अपक्षपाती थे और स्वयं के सत्य परमानंद सवरूप में स्थित थे | ऐसे संतो का मार्गदर्शन सबके लिए बहुत लाभकारी है वह जो सारे राग और देष द्वेष से परे है और उस परमतत्व में स्थित हो चुके है वो सबसे ऊँचे एवं महान है | जो कोई उनकी आज्ञा मानता है वो जल्दी ही ऊँची स्थिति प्राप्त कर लेता है, वो जो कहते है वो पहले रुचिकर ना भासता हो पर उसे पूरे हृदय से स्वीकार करना चाहिए, ऐसा करने से उसका बहुत भला होता है, पक्की बात है |
गुरु गीता कहती है गुरुओ की बात सच्ची हो या झूठी परन्तु उसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए, दिन और रात गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए उनके सानिध्य में दास बनकर रहना चाहिए |
    जैसे कि जब एक बच्चा विद्यालय में जाता है तो अध्यापक उसे कहते है कि पृथ्वी गोल है, भले ही वो जानता, समझता नहीं भी है फिर भी वो उस बात को मान लेता है उसे बाद में समझ आती है इसी प्रकार हमें ब्रह्मनिष्ठ गुरुओ की, मुक्त संतो के विचारो, सिद्धांतो को मान लेना चाहिए की हम यह शरीर नहीं, हम ब्रह्म है |    
    तदनंतर आप दृढ़ता से इस सत्य को आत्मसात कर लोगे तो धीरे धीरे आप भी इसे समझ जाओगे और ब्रह्म का अनुभव कर लोगे |
वह ब्राह्मण पुत्र सर्वतपा मुनि के पास भी गया और सारा वृतांत कह सुनाया कि मेरे माता-पिता मेरे ही आँगन में बैल और कुतिया के रूप में रहते है | सो यह मेरा जन्मजात कर्त्तव्य है कि मै अपने माता-पिता की मुक्ति के लिए कुछ यत्न करूँ, कृपया मुझे उनकी मुक्ति के लिए कोई रास्ता और उपाय बताइए |
   सर्वतपा मुनि थोड़ी देर के लिए अपने आप में शांत हुए जंहा से ब्रह्माण्ड भर को ज्ञान मिलता है और कहा तुम्हारी माता ने मासिक धर्म के दिनों में मानने वाले नियमो का उल्लंघन किया है | इस पाप के फलस्वरुप उसे कुतिया की योनी में जन्म लेना पड़ा है और तुम्हारे पिता ने अनजाने में मूर्खतावश उसके पाप को स्वीकार किया है, इसीलिए उसे बैल की योनी में जन्म लेना पड़ा है | उसे यह मानव देह मिली थी जो बुद्धि जैसे सद्गुणों से संयुक्त है पर वो इन सद्गुणों का सदुपयोग नहीं कर पाया और मूर्खताभरा व्यवहार किया सो उसे बैल की योनी में जन्म लेना पड़ा |
  सर्वतपा मुनि ने फिर उनकी मुक्ति के लिए उपाय बताया, यह पशु शरीर उपवास के नियम को नहीं समझ सकते है | तुम बैल को चारा दिए बिना एवं कुतिया को रोटी दिए बिना भूखा रख सकते हो, लेकिन वे शायद ही समझ पाए कि वे उपवास कर रहे है, उन्हें विवशता में भूखा रहना किसी प्रकार का पुण्य नहीं देगा क्योकि उपवास का पुण्य तभी मिलता है जब वो खुद की इच्छा से किया हो | इसलिए तुम्हे उनके लिए उपवास रखना चाहिए | ऋषि पंचमी के दिन उपवास रखो तथा साथ में पूर्व वर्णित सप्तऋषि एवं अरुंधती (महर्षि वसिष्ठ की पत्नी) की पूजा करो और उन्हें याद करो | उस दिन अपने ध्यान, जप, उपवास का पुण्य अपने माता पिता को उनके पाप से मुक्ति के लिए उन्हें अर्पण करो | ऐसा करने से तुम्हारे माता पिता को ऋषियों के ऋण से छूटने का एक मौका मिलेगा और उनकी मुक्ति हो जाएगी |
 ब्राह्मण के पुत्र और उसकी पत्नी ने ऋषि पंचमी का उपवास रखा और उसके पुण्य का अपने माता-पिता को दान कर दिया | जिससे उसके दोनों माता एवं पिता पशु योनी से मुक्त होकर स्वर्ग को चले गए |
   सामान्यतया स्त्रियाँ ऋषि पंचमी का उपवास रखती है | कथा के अनुसार जो कोई स्त्री मासिक धर्म सम्बन्धी, वैदिक नियमो का उल्लंघन करती है और अनजाने में भी उन दिनों में किसी ऋषि के दर्शन करती है तो ऐसा कर के पाप लगता है और उससे छूटने के लिए उसे ऋषि पंचमी का उपवास करना चाहिए और ऋषियों से क्षमा मांगनी चाहिए |
आज की आधुनिक स्त्रियाँ कहेगी कि मुझे इन सब रीती-रिवाजो में विश्वास नहीं | फलस्वरुप  उसे उसका फल भुगतना पड़ता है कि उसके नवजात बच्चे तेजहीन और विकृत होते है |
ऋषियों और मुनियों को आर्षद्रष्टा भी कहा जाता है | उन्होंने सारे सिद्धांत और नियम पूरी तरह खोज बीन कर के बनाये है, अपने मन से कुछ भी नहीं बनाया है | आप खुद देख सकते हो कि जब घर में कोई भी स्त्री मासिक धर्म के दिनों में हो तो आप का मन इतना प्रफुल्लित और आनंदित नहीं रहेगा जितना दूसरे दिनों में रहता है |
    मै कई सारे ऐसे योगी और सन्यासी साधको को जनता हूँ जो योग और तपस्या में लगे है लेकिन अपनी नित्यनियम की जरूरतों का ख्याल रखने के लिए किसी स्त्री को रखा है और वह स्त्री मासिक धर्म के दिनों में स्वछता रखने में सहमत नहीं है | ऐसे योगी और तपस्वी ने अपनी योग और तपस्या की प्रभा खो दी, वो कुछ प्रभावित करने में नाकाम रहे | वैसे मेरे गुरूजी ने बहुत ज्यादा तप या योग नहीं किया फिर भी उनके पास वो अनोखी और निराली ताकत थी कि किसी को भी अपनी नजरो से निहाल कर देते थे क्यूंकि वो ऐसे मामलो में खूब सावधानी रखते थे |
   मेरे गुरुदेव भी स्त्रियों की आजादी में विश्वास रखते थे परन्तु वो आजादी नहीं जो आज देखने को मिलती है | आज जिसे आजादी कहा जा रहा है वो हकीकत में बेशर्मी है, स्त्रियाँ दिन पर दिन लाचार हो रही है, स्त्रियों की सच्ची आजादी तो ऋषियों के नजरिये से ही पा सकते है | यंहा पर कई विदुषी महिलाओ की कथा है जैसे मदालसा, जीजाबाई, चुडाला, दीर्घतपा की पत्नी इत्यादि | जवान महिलाओ जैसे गार्गी और सुलभा ने अध्यात्मिक प्रवचन और प्रतियोगिता में विजेता रहने वालो के साथ में वाद-विवाद और प्रश्नोत्तर किया है | कई महिलाओ ने तो ऋषियों के पद को पा लिया और उनके शब्दों को उपनिषद्ध में लिखा गया है | आज की महिला में चमक, कांति, ताकत और गूंजने वाली आवाज कंहा है ? प्रभाव वाले बच्चे वहीं पैदा होते है जिस परिवार में संयम से रहते है और वैदिक नियमो का पालन करते है |



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