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शिशु व बालक जन्म वक़्त

शिशु व बालक जन्म वक़्त

बालक जन्मते ही दाई या नर्स बच्चे को नहलाकर पिता की गोद में बच्चे को दे और पिता बच्चे के कान में निम्नलिखित मंत्र बोले -

७ बार ॐ का उच्चारण करके "अश्मा भव" तू चटान की नाई अडिग रहना l

७ बार ॐ का उच्चारण करके "परशु भव: " तू कुल्हाड़े की नाई विघ्न बाधा को काटने वाला बनना l

७ बार ॐ का उच्चारण करके "हिरण्यमस्तु भव" तू चैतन्य अमर आत्मा है, तुझे कोई दोष ना लगे l

फिर माँ दूध पिलाने से पहले शहद और घी विमिश्रण करके सोने की सलाई से बच्चे की जीभ पर "ॐ" लिखे, फिर उसे दूध पिलाये l

जन्म से २ साल तक शैशव अवस्था होती है - शैशव काल में बच्चा जब हाथ-पैर हिलाने लगे तो उसे गोद में ज्यादा नहीं लेना चाहिए, इससे बच्चों के विकास में बड़ी हानि होती है l हाथ पैर चलने दें, बच्चा मजबूत बने l उसकी प्रतिभा विकसित करने के लिए उसे हँसते-खेलते रखना चाहिए l उसकी अनुकूल वस्तुएं दिलानी चाहिए, नहीं दे सकते तो बोलना चाहिए, चिंता नहीं, आ जायेगी, उसको निषेधात्मक नहीं बोलना चाहिए l उसे पेट की बीमारियाँ ना हों, ये ध्यान रखना चाहिए, अगर पेट की तकलीफ है तो पपीते के बीज २-३ कूट के पिलायें अथवा तुलसी के बीज कूट दें फिर १/४ चुटकी चूर्ण, रात को भिगो कर सुबह पिलायें l

२-५ साल तक उसके मन में जिज्ञासा (जानने की वृति) फूटती है l जो वह पूछे उसे उत्साह से उत्तर दें और उसके सामने प्रश्न लायें जिससे उसकी प्रतिभा विकसित हो l उसे रात को कहानियों के माध्यम से जानने की वृति और विचार की शक्ति पैदा करें

Mathura 1st Oct. 2009



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